... ग़ज़ल.....
सोया हुवा नसीब जगाएँ तो बात हो
नज़रें वो मुस्कुराके झुकायें तो बात हो
टल जाएँ दफअतन यह बालाएं तो बात हो
महफिल में अपनी मुझ को बुलाएँ तो बात हो
वादे तो खैर टूटते रहते है बार बार
एक बार अपना वादा निभाएं तो बात हो
उन कि ज़ुबाँ पे ज़िक्र मेरा हो तो कुछ कहूँ
अशआर मेरे वो जो सुनाएं तो बात हो
मुंह फेर कर वह बैठे हैँ क्या बात हो सके
पूरी तरह वो सामने आएं तो बात हो
हम दो क़दम बढ़ें वो चले आएं दो क़दम
इस तरह दूरियों को मिताएं तो बात हो
हम में तड़प तो खूब है उन में तड़प भी हो
थोड़ा सा वो भी हाथ बढ़ाएं तो बात हो
पिछली रुतों कि तल्ख़ कहानी को भूल कर
आएं गले से मुझ को लगाएं तो बात हो
उठ उठ के देखते हों नज़ीरी मुझे सभी
वो अपने पास मुझ को बुलाएँ तो बात हो
मसीहुद्दीन नज़ीरी
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